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बौद्ध धर्म के बारे में

बौद्ध धर्म के बारे में.

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महात्मा बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक हैं । उनका जन्म लुंबिनी नामक स्थान पर राजा शुद्धोदन के यहाँ हुआ था । उनके जन्म के समय ज्योतिषियों ने बताया था कि यह बालक या तो चक्रवर्ती सम्राट् बनेगा या अपने अलौकिक ज्ञान से समस्त संसार को प्रकाशित करने वाला संन्यासी ।

अत: इसी डर से राजा ने बालक के लिए रास-रंग के अनेक साधन जुटाए । किंतु राजसी ठाट-बाट उन्हें जरा भी पसंद न था । एक बार वे सैर के लिए रथ पर सवार होकर महल से बाहर निकले । उन्होंने बुढ़ापे की अवस्था में एक जर्जर काया को देखा, रोगी को देखा, फिर एक मृत व्यक्ति की  अस्थी को ले जाते हुए देखा ।

इनसे उनके जीवन पर एक अमिट प्रभाव पड़ा । गौतम को वैराग्य की ओर जाने से रोकने के लिए राजा शुद्धोधन ने यशोधरा नाम की रूपवती कन्या (राजकुमारी) से उनका विवाह करा दिया । उनके राहुल नाम का एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ ।

महात्मा बुद्ध दुःख और कष्टों से छुटकारा पाने के उपाय के बारे में सोचने लगे । एक रात वे पत्नी और पुत्र को सोता छोड़कर ज्ञान की खोज में निकल गए । कई स्थान पर ध्यान लगाया । शरीर को कष्ट दिए, लंबे-लंबे उपवास रखे, लेकिन तप में मन न रमा ।

अंत में बोधगया में एक दिन पीपल के एक वृक्ष (बोधिवृक्ष) के नीचे ध्यान लगाकर बैठे । कठोर साधना के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया । इसी कारण उनका नाम ‘बुद्ध’ हो गया । बुद्ध का अर्थ होता है: ‘जागा हुआ’, ‘सचेत’, ‘ज्ञानी’ इत्यादि । अब उन्होंने लोगों को कुछ शिक्षाएँ दी थीं । उन शिक्षाओं को ‘चार आर्य सत्य’ का नाम दिया गया है, जो इस प्रकार हैं:

१. सर्वं दुःखम्,

२. दुःख समुदाय,

३. दुःख विरोध,

४. दुःख विरोध-मार्ग ।

वास्तव में गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों में अहिंसा, शांति, दया, क्षमा आदि गुणों पर विशेष रूप से बल दिया है । भगवान् बुद्ध के उपदेशों को जिस ग्रंथ में संकलित किया गया है, उसे ‘धम्मपद’ कहा गया है । बौद्ध मंदिरों में बुद्ध की प्रतिमा रहती है । वाराणसी के पास ‘सारनाथ नामक’ स्थान बौद्ध-मंदिर के लिए विख्यात है । बुद्ध के अनुयायियों (बुद्ध के रास्ते पर चलनेवाले) को ‘बौद्ध भिक्षु’ कहा जाता है ।

वे मठों में रहते हैं । उस काल में अनेक मठ-विहार स्थापित हुए । अनेक राजाओं ने बौद्ध धर्म अपनाया । सम्राट् अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और फिर उसका तेजी से प्रसार हुआ । अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए लंका भेजा । बौद्धों का प्रिय कीर्तन वाक्य हैं: बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि

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