पारसी धर्म के बारे में topjankari.com

पारसी धर्म के बारे में

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पारसी धर्म का जन्म फारस में हुआ । वही फारस, जिसे आज हम ईरान के नाम से जानते हैं । पारसी धर्म की शुरुआत जोरोस्टर नामक पैगंबर ने की थी । ईसा-पूर्व सातवीं शताब्दी में जोरोस्टर का जन्म अजरबैजान में हुआ था ।

जोरोस्टर के पिता का नाम था: पोरूशरप । उसके पिता ‘स्पितमा’ वंश के थे ।  उनकी माता का नाम द्रुधधोवा था । वे भी एक श्रेष्ठ वंश की थीं । कहा जाता है कि उनकी माँ ने उन्हें मात्र पंद्रह वर्ष की अवस्था में जन्म दिया था । एक दैवी प्रकाश ने द्रुधधोवा के गर्भ में प्रवेश किया था, जिससे जोरोस्टर का जन्म हुआ था ।

जोरोस्टर एक चमत्कारी बालक था । जोरोस्टर को कृष्ण की ही भाँति तरह-तरह की लीलाएँ करने में आनंद आता था । उनकी अनेक चमत्कारपूर्ण कथाएँ चर्चित हैं । कहा जाता है कि सात वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अध्ययन-कार्य शुरू कर दिया था । उन्होंने पंद्रह वर्ष की अवस्था तक धर्म और विज्ञान का ज्ञान प्राप्त कर लिया था ।

उसके बाद वे अपने घर लौट आए, फिर उन्होंने अपने अगले पंद्रह वर्षों को चिंतन और मनन करने में व्यतीत किया । उन्होंने लंबे समय तक साधना की, तब जाकर उन्हें ज्ञान का प्रकाश मिला । जिस तारीख को जोरोस्टर को ज्ञान का प्रकाश मिला, वह ५ मई, ६३० ईसा-पूर्व की थी । इस तारीख को पारसी धर्म में ‘पहला वर्ष’ माना गया ।

पारसी ज्ञान के देवता को ‘प्रकाश का देवता’ भी कहते हैं । इस तरह वे प्रकाश के देवता को ‘अहुरा-मजदा’ कहते हैं । ‘अहुरा-मजदा’ पारसियों के सबसे बड़े देवता माने जाते हैं । पारसी लोग विश्व की रचना करनेवाले और रक्षा करनेवाले ‘अहुरा-मजदा’ की पूजा-आराधना करते हैं ।

इस प्रकार अहुरा-मजदा की पूजा करने के लिए ‘पारसी धर्म’ की नींव पड़ी । पारसी लोग जहाँ अपना धार्मिक कार्य करते हैं, उसे ‘फायर टेंपिल’ कहते हैं । वहाँ पूजा-पाठ करनेवाले लोग भी अपने ढंग से पूजा-पाठ करते हैं । उसमें से कुछ लोग महीने में चार बार और कुछ लोग प्रतिदिन पूजा-पाठ करते हैं ।

पारसी लोग अपने मृतक को न तो जलाते हैं और न ही दफनाते हैं । विचित्र बात तो यह है कि ये मृतक शरीर को ज्यों-का-त्यों छोड़ देते हैं । उन्हें गिद्ध-कौए आदि खा जाते हैं । पारसी लोग मृतकों को जहाँ छोड़ते हैं, उस स्थान को ‘मौन का मीनार’ कहते हैं । इस तरह उस छत पर ये मृतक को छोड़ जाते हैं ।

सात और आठ वर्ष के पारसी बालकों का हिंदुओं की तरह यज्ञोपवीत संस्कार होता है । विवाह के समय जब दूल्हा-दुल्हन यज्ञ-मंडप में बैठते हैं, तब दोनों ओर के गवाही देनेवाले भी वहाँ उपस्थित होते हैं । उनकी संख्या २ होती है और २ से अधिक भी ।

विवाह के समय जिस तरह हिंदुओं में नारियल, अक्षत आदि वर-वधू पर फेंके जाते हैं, उसी प्रकार पारसी धर्म में भी यह संस्कार होता है । पारसी धर्म में कुछ बातें ईसाई धर्म तथा कुछ हिंदू धर्म से मिलती-जुलती हैं । हिंदुओं की तरह पारसी भी स्वर्ग-नरक में विश्वास करते हैं ।

पारसियों का मानना है कि मरने के बाद आत्मा परलोक में पहुँचती है । वहाँ उनके कर्मों का लेखा-जोखा देखा जाता है । उसके बाद निर्णय सुनाया जाता है कि वह पुण्य का भागी है अथवा पाप का । हिंदुओं में भी ऐसी ही मान्यता है ।

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